दरभंगा:दरभंगा राज केवल एक रियासत नहीं था, बल्कि शिक्षा, संविधान, राष्ट्र रक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भारत की आत्मा से जुड़ा एक ऐसा अध्याय था, जिसकी गूंज आज भी देश के इतिहास में सुनाई देती है। दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ भले ही एक युग का पटाक्षेप हो गया हो, लेकिन महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी द्वारा राष्ट्र के लिए किए गए अतुलनीय योगदान भारत की स्मृति से कभी मिट नहीं सकते।
दरभंगा राज का योगदान केवल मिथिला या बिहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने पूरे देश के सामाजिक, शैक्षणिक और संवैधानिक ढांचे को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा के विस्तार से लेकर संविधान निर्माण तक और युद्धकाल में राष्ट्र की सहायता से लेकर कला-संस्कृति के संरक्षण तक, दरभंगा राज ने हर मोर्चे पर अपनी राष्ट्रनिष्ठा का परिचय दिया।
संविधान निर्माण में ऐतिहासिक सहभागिता
भारत के संविधान निर्माण में दरभंगा राज की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। वर्ष 1950 में गठित संविधान सभा के कुल 284 सदस्यों में महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी कामसुंदरी देवी दोनों शामिल थे। वे 1947 से 1950 तक संविधान सभा के सक्रिय सदस्य रहे। कहा जाता है कि जब संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे, तब महाराज कामेश्वर सिंह ने अपने हस्ताक्षर के साथ ‘दरभंगा’ का नाम भी अंकित किया था, जो उनके क्षेत्रीय गौरव और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक माना जाता है।
महाराज कामेश्वर सिंह 1907 से 1962 तक बिहार क्षेत्र से संविधान सभा और उससे जुड़े निकायों में प्रतिनिधित्व करने वाले एकमात्र सदस्य रहे। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि महारानी कामसुंदरी देवी संविधान सभा के सदस्यों की पत्नियों में अंतिम जीवित सदस्य थीं। उनके निधन के साथ भारतीय राजशाही से जुड़ी एक जीवंत संवैधानिक कड़ी भी समाप्त हो गई।
शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय दान परंपरा
दरभंगा राज का शिक्षा के प्रति समर्पण अद्वितीय रहा। महारानी कामसुंदरी देवी द्वारा दान किया गया दिल्ली स्थित दरभंगा हाउस आज देश की राजधानी में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के मुख्यालय के रूप में उपयोग में है। वहीं, दरभंगा का भव्य नरगौना पैलेस ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को दान किया गया, जहां आज विश्वविद्यालय का स्नातकोत्तर विभाग संचालित होता है। यह वही भवन है, जो अपने समय में भूकंपरोधी संरचना, एयर कंडीशनिंग और लिफ्ट जैसी अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त था।
पटना स्थित दरभंगा हाउस को पटना विश्वविद्यालय के लिए समर्पित किया गया। इलाहाबाद और बनारस जैसे शिक्षा केंद्रों में भी राज परिवार द्वारा विश्वविद्यालयों को बड़ा सहयोग दिया गया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) को महाराज कामेश्वर सिंह द्वारा 50 लाख रुपये का दान दिया गया था, जो उस समय एक असाधारण राशि मानी जाती थी। इसके अलावा दरभंगा मेडिकल कॉलेज के लिए भवन और भूमि का दान भी राज परिवार की दूरदर्शिता का प्रमाण है।
राष्ट्र संकट में था तो राजसंपत्ति भी न्योछावर
दरभंगा राज की राष्ट्रभक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश गंभीर संकट से गुजर रहा था, तब महाराज कामेश्वर सिंह ने दरभंगा के इंद्र भवन मैदान में आयोजित सभा में राष्ट्र को तीन विमान और लगभग 600 किलोग्राम सोना दान कर दिया। इसी क्रम में दरभंगा में स्थित लगभग 90 एकड़ में फैला हवाई अड्डा भी सरकार को सौंप दिया गया, ताकि देश की रक्षा तैयारियों को मजबूती मिल सके।
विज्ञान, संस्कृति और प्राच्य विद्या के संरक्षक
महाराज कामेश्वर सिंह विज्ञान और शोध के भी बड़े संरक्षक थे। उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन को उनके अध्ययन और शोध कार्य के लिए एक बहुमूल्य हीरा दान में दिया था। प्राच्य विद्या के संरक्षण हेतु उन्होंने अपने एक आवास को संस्कृत शिक्षा के लिए समर्पित किया, जो आज कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है।
कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी दरभंगा राज का योगदान अतुलनीय रहा। शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और लोकगायक रामचतुर मल्लिक जैसे महान कलाकार दरभंगा राज के संरक्षण में पले-बढ़े और दरबार से जुड़े रहे। संगीत, साहित्य और लोकसंस्कृति को राज परिवार ने सदैव प्रोत्साहित किया।
रेलवे विकास से बदली क्षेत्र की तस्वीर
वर्ष 1874 में दरभंगा राज परिवार ने अपने संसाधनों से तिरहुत रेलवे कंपनी की स्थापना की, जिसका मुख्यालय दरभंगा राज परिसर स्थित मोती महल में बनाया गया। इंग्लैंड की कंपनी द्वारा इस रेलखंड का निर्माण कराया गया। वाजितपुर टर्मिनल से नरगौना टर्मिनल तक लगभग 55 मील लंबी रेल लाइन मात्र 62 दिनों में तैयार की गई थी। इसी लाइन पर पहली ट्रेन बाजितपुर से दरभंगा पहुंची। इस रेलवे नेटवर्क ने पूरे क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को नई दिशा दी और हजारों लोगों को गिरमिटिया मजदूरी के लिए विदेश जाने से भी बचाया।
दरभंगा राज और महारानी कामसुंदरी देवी द्वारा राष्ट्र के लिए किए गए ये योगदान आज भी भारत के सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हैं। राजशाही भले ही इतिहास बन गई हो, लेकिन दरभंगा राज की विरासत आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र सेवा और त्याग की प्रेरणा देती रहेगी।